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My dream moment of love

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इन दिनों जो सपने में कई दिनों से देख रही हूँ, लौट लौट कर जाते हुए। वो एक मेट्रो स्टेशन है। मैं हमेशा वही एक मेट्रो स्टेशन देखती हूँ। काफ़ी ऊँचा। कोई तीन मंज़िल टाइप ऊँचा है। और मैं हमेशा की तरह सीढ़ियों से चढ़ती या उतरती हूँ। इसे देख कर कुछ कुछ कश्मीरी गेट के मेट्रो की याद आती है। वहाँ की ऊँची सीढ़ियों की। मैं कब गयी थी किसी से मिलने, कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन पर उतर कर? याद में सब भी कुछ साफ़ कहाँ दिखता है हमेशा। या कि अगर दिखता ही हो, तो हमेशा जस का तस लिख देना भी तो बेइमानी हुआ। वो कितने कम लोग होते हैं, जिनका नाम हम ले सकते हैं। किसी पब्लिक फ़ोरम पर। ईमानदारी से। फिर ऐसे नाम लेने के बाद लोग एक छोटे से इन्सिडेंट से कितना ही समझ पाएगा कोई। हर नाम, हर रिश्ता अपनेआप में एक लम्बी कहानी होता है। छोटे क़िस्से वाले लोग कहाँ हैं मेरी ज़िंदगी में। इस मेट्रो स्टेशन के पास नानी की बहन का घर होता है। स्टेशन से कुछ डेढ़ दो किलोमीटर दूर। हमेशा। मैं जब भी इस मेट्रो स्टेशन पर होती हूँ, मेरे प्लैंज़ में एक बार वहाँ जाना ज़रूर होता है। आज रात सपने में में इस मेट्रो स्टेशन से उतर कर तुम्हारे बच...

गुबार है, निकल जाये तो बेहतर है....

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मुझे नहीं पता इंसान धोखा देने पर या झूठ बोलने पर कब मजबूर होता है.... लेकिन जब ऐसा कुछ हो कि आपको बहुत गर्व हो कि आपने किसी को धोखा दे दिया तो याद रखना चाहिए कि सामने वाला मूर्ख नहीं बल्कि उसे आप पर भरोसा है, धोखा उसे ही दिया जा सकता है जिसे आप पर भरोसा हो.... खुद को उम्र मे बड़ा और समझदार बताने वाले कभी कभी ऐसी हरकत कर गुजरते हैं कि उनकी समझदारी दो कौड़ी की भी नहीं रह जाती... अब तक कई लोगों ने विश्वास तोड़ा है, मानसिक और आर्थिक दोनों तरीके से नुकसान पहुंचाया है शायद इसलिए कि मैं जल्दी ही किसी पर भरोसा कर लेता हूँ... लेकिन खुशी है कि उन लोगों में से सभी लोगों की नज़दीकियों से उबर गया हूँ, कुछ लोग कहते हैं कि असल बात तब हो जब वो लोग मेरे नजदीक रहते हुये भी मुझपर कोई प्रभाव न डाल पाएँ, लेकिन संभव नहीं हो पाता... हाँ, चाहूँगा ज़रूर कि ऐसा हो पाये भविष्य में, इसलिए कुछ अनचाहे लोगों को न चाहते हुये भी ज़िंदगी में रख छोड़ा है, देखते हैं नज़रअंदाज़ कर के भी...  ज़िंदगी की करवटें बहुत कुछ सिखाती हैं, कुछ करवटें ज़िंदगी के बिस्तर पर सिलवटें भी छोड़ जाती हैं... सिलवटें जितनी जल्दी सीधी हो जा...

तुम प्यार करोगी न मुझसे..

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तुम प्यार करोगी न मुझसे, तब, जब मैं थक के उदास बैठ जाऊँगा तब, जब दुनिया मुझपे हंस दिया करेगी तब, जब अँधेरा होगा हर तरफ तब, जब हर शाम धुंधलके में भटकूँगा मैं उदास तब एक उम्मीद का दिया जगाये तुम प्यार करोगी न मुझसे... तब, जब मुझे दूर तक तन्हाई का रेगिस्तान दिखाई दे  तब, जब मेरे कदम लड़खड़ाएं इस रेत की जलन से  तब, जब मैं मृगतृष्णा के भंवर में फंसा हूँ  तब, जब इश्क़ की प्यास से गला सूख रहा हो मेरा  तब अपनी मुस्कान ओस की बूंदों में भिगोकर  तुम प्यार करोगी न मुझसे... तब, जब ये समाज स्वीकार नहीं करे इस रिश्ते को तब, जब प्रेम एक गुनाह मान लिया जाए तब, जब सजा मिले हमें एक दूसरे के साथ की तब, जब मुँह फेर लेने का दिल करे इस दुनिया से तब इस साँस से लेकर अंतिम साँस तक तुम प्यार करोगी न मुझसे...  You might also like: अपने सबसे प्यारे दोस्त को ताउम्र खुश रख पाने का सुख..... कांच के शामियाने... सिर्फ उपन्यास या किसी का सच... मैं तुमसे भाग के भी तुम तक ही आऊँगा...

closed room....ugg yeh ratein

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इन दिनों मैं बहुत कुछ ऐसा सोचने लगा हूँ जो मैं नहीं चाहता कि तुम पढ़ो, कुछ रद्दी से पड़े पन्नों पर लिखकर उसे फाड़ कर फेक देता हूँ.... कभी हमारे बीच में की गयी कुछ अनकही बातों के सिरे को भी पकड़ो तब भी उससे नयी कोई बात नहीं निकलती... ससर गाँठ की तरह सारी पुरानी बातों के गिरहें खुलकर बस सीधा सन्नाटा बच जाता है... मैं फिर से ख़ानाबदोश होने लगा हूँ, दिन भर बेफालतू इधर उधर बौखलाया फिरता हूँ ... इंसान चाहकर भी अपनी परछाईयों से नहीं भाग सकता, शायद इसलिए मुझे अंधेरा अच्छा लगता है... किसी से नज़र चुराने की ज़रूरत नहीं है, खुद से खुद की बातों में खो जाना ही असीम सुख है... कितना अच्छा होता न अगर अंधेरा ही सच होता, इस तेज रौशनी में मेरी आखें चौंधिया जाती है, दिल में जलन होती है सो अलग...  शाम को इस अंधेरे से कमरे में बैठकर अपने अंदर की रगड़ सुन रहा हूँ, दिमाग बार-बार दिल को कहता है आखिर ज़रूरत क्या थी इश्क़ करने की, अब भुगतो... और दिल चुपचाप खुद को एक कमरे में बंद कर लेता है, मुझे डर लगता है कहीं यूं अकेले रहते रहते मैं किसी बंद कमरे में तब्दील न हो जाऊँ...  रात एक माचिस है,  और ...

मेरे बीते हुए पल....

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काश मेरे बीते हुए पल मेरे पास होते हैं... आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है... मैं नहीं जानता कि मेरे साथ ही ऐसा होता है तुम्हारे साथ भी ऐसा होता होगा इन दिनों ऐसा लगता है जैसे मैंने अपना वजूद एक बार फिर से खो दिया है, चाहे कितना भी खाली वक़्त मिल जाये समझ नहीं आता कि क्या करना है... कितनी ही बार पूरा दिन ऐसे ही बिस्तर पर पड़े पड़े ही गुज़ार दिया है... पता नहीं क्यूँ मुझे कोई इतना अच्छा नहीं लगता कि उससे बात की जाये, लगता है अकेले ही वक़्त बिता लिया जाये तो बेहतर है... इतने सालों की जद्दोजहद के बाद जमापूंजी के रूप में बस कुछ खूबसूरत यादें हैं, अब तो उनको याद करके भी आँसू ही आते हैं... "डैडी" फिल्म में एक संवाद था न कि "याद करने पर बीता हुआ सुख भी दु:ख ही देता है...." मैं शायद उम्र के ऐसे दौर पर हूँ जब मूड स्विंग्स होते हों, लेकिन जिस रंज और दर्द के शहर में अपना वजूद तलाश रहा हूँ वो मुझे अपने ब्लॉग या डायरी में ही मिलता है.... कितनी अजीब बात है मेरे ब्लॉग का पता हर किसी के पास है अलबत्ता यहाँ कोई अपना दर्द पढ़ने नहीं आता, शायद कुछ लोग ऐसे होंगे जो इस दर्द में अपना...

सपने

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सपने या तो अच्छे होते हैं या फिर बुरे पर मेरे सपने इन दायरों में नहीं आते मेरे सपने खौफनाक होते हैं मेरे सपने मुझे उन हादसों से रूबरू करवाते हैं जिनके पीछे दर्दनाक इतिहास होता है जैसे की ये घर  मुझसे पहले इस घर  में रहने वाली एक लड़की की गला घोंटकर हत्या की गई थी मुझे आज भी उस लड़की की चीखें सुनाई देती है रात दर रात उसकी मौत का आधा अधूरा मंजर मेरे सपने में और साफ होता जा रहा है अब तो जागते हुए भी ऐसा लगता है जैसे कोई आस पास है पर मैं बस यही उम्मीद करता हूं कि बुरे सपनों का यह दौर  बस यहीं तक सीमित रहें                                                                               ...

Kash tum mere pas hoten....

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तुम्हारे मेरे पास होना बहुत मुश्किल जान पड़ता है काश ! तुम मेरे पास होते !! चूँकि , तुम मेरे पास नही हो , इसलिए मैं तुम्हे रोज लिखना चाहती हूँ - अपने दिल के हालत , अपने हर ज़ज्बात ..... ................................... ..............................................!!! हर रात जब मेरी आँखों में रतजगे का सैलाब उमड़ता है - उन लहरों में मुझे डूबते-उतराते सिर्फ तुम्हारा ही चेहरा दिखता है ! क्यों मैं तुम्हारे अभिमान को नही समझना चाहती हूँ , तुम न भी बुलाओ फिर भी क्यों तुम्हारे करीब आना चाहती हूँ ... आखिर क्यों ?? आखिर क्यों तुम्हारी उत्तापहीन आँखे मेरे प्यार से नम नही होती ? हालांकि मैं तुम्हे कुछ ही दिनों से जानती हूँ , लेकिन ऐसा क्यू लगता की जैसे मैं तुम्हे हजारो वर्षो से पहचानती हूँ ? हम कब और कैसे मिले , कुछ ख़ास याद नही ........ बस इतना ही , की जैसे किसी जलती दुपहरिया में  मेरी हथेलियों पे छाँव लिख दिया हो ! उस वाकहीन नि:शब्दता में मैं सिर्फ तुम्हे देखती ही रह गई थी ! जैसे की हम अनंत काल से एक-दूजे की तलाश में भटक रहे हो .. औ...