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Princess

(In.. Dream...) Heeyy  Woh dekho Meri princess jisko Dekhne ke liye meri ankhein tarsa gyi thii...Main jata hoon uske pas... Dhere dhere h kadam rakhunga.. nhi toh darr kar bhag jayegi .... Ohh   shit  sssshhhhsssshh... Thank god usko pta nhi chala ki main uske piche hoon...  Main toach krta hoon phir achanak dekhegi piche... Aaayy yrr kanhi chali na jayeee..... Ohhhhhh shit... Kaha gyi kaha gyi arry yrr sapna dekh Raha tha...chalo usko dekho liya dil ko sakoon mila... Woh..uska chehra hamesha mere ankhon main bassa rahega....Woh uski lambi lambi julfe... Jo beparwah udd rahi thi...Aur Woh ...  In  draft ..     Continue (coming soon)

Gunn gunaa ne do dhadhkne do

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वे दोनों हर शाम मिलते थे, देर तक बैठ कर वो खूब बातें करते थे. आदत से मजबूर, लड़का अक्सर फिल्मों या किताबों का जिक्र छेड़ देता. लड़की इस बात पर लड़के को टोकती नहीं, कि वो हमेशा फिल्मों की बात क्यों करने लगता है, बल्कि वो लड़के की बातों में दिलचस्पी लेने लगती. कभी कभी लड़का गानों का जिक्र छेड़ देता. लड़का गानों का जिक्र जानबूझ कर छेड़ता. वो जानता था कि गानों के जिक्र से लड़की गुनगुनायेगी, और लड़के को लड़की का यूँ गुनगुनाना बहुत पसंद था. लड़के और लड़की का ये गाना-गुनगुनाना कुछ कुछ अन्ताक्षरी जैसा ही होता, बस इसमें कोई नियम और हार-जीत नहीं थे. एक ऐसी ही खूबसूरत शाम थी. दोनों एक दुसरे का हाथ थामे शहर के सनसेट पॉइंट पर खड़े थे. खूब ठंडी हवा चल रही थी और मौसम बेहद रोमांटिक था. लड़के के मन में कुछ शरारत सूझी और उसनें लड़की को झटके से अपने बेहद करीब खींच लिया, और एक गाने के बोल गुनगुनाने लगा - ये रतजगे, लम्बी रातों के दिल ना लागे क्या करूं? ये सिलसिले, दिल की बातों के जादू चले क्या करूं बिखरा ज़ुल्फ़ें सो जाऊं, दिल चाहे कहीं खो जाऊं मदहोश दिल की धड़कन ...चुप सी ये तन्हाई लड़के के इस ‘मूव’ से लड...

Magician

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दोपहर बीत चली थी लेकिन बारिश थी कि रुकने का नाम नहीं ले रही थी. लड़का अपने कमरे में बैठे बारिश के रुकने की प्रतीक्षा कर रहा था. दो दिन से तेज़ ज़ुकाम और हलके बुखार की वजह से वो घर में कैद था और इन दो दिनों से लगातार बारिश हो रही थी. अपने बालकनी में बैठे बारिश की बूँदों को देख वो सोच रहा था कि कभी जनवरी की बारिश कितनी ख़ास होती थी लेकिन अब तो जैसे जनवरी की बारिश भी कोई मायने नहीं रखती. पिछले कुछ सालों में बहुत कुछ बदल गया था. कई यकीन, कई सपनें टूट गए थे. एक के बाद एक उसे अपनी हर नाकामी याद आ रही थी. दिन में कई बार उसने सोचा कि घर पर बात कर ले, लेकिन वो जानता था कि घर पर उसकी हलकी बिमारी की खबर भी सबको बेचैन कर देती है. अपने घरवालों को वो अब और कोई तकलीफ नहीं देना चाहता था. वो उस लड़की से भी बात करना चाहता था जो उसके सुख दुःख की साथी थी. लड़के के माँ-बाप, छोटे भाई और बहन के अलावा पूरे दुनिया में एक वही तो थी जो उसकी हर बात समझती थी. लेकिन जाने किस हिचक से या अनजाने डर से वो उसे फोन नहीं कर पाया था. दो दिन पहले उसकी लड़की से बात हुई थी और तब लड़की का मन बेहद अशांत था. लड़की के परिवार में उन दोनों ...

Pyar Ek Safar Hai Aur Safar Chlta Rehta hai

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  पार्क में बैठना कितना सुकून देता है, बस थोड़ी देर ही सही... मुझे भी अच्छा लगता है बस यूँ ही बैठे रहो और आस-पास देखते रहो... कई तरह के लोग... हर किसी की आखों से कुछ न कुछ झांकता रहता है... ढलती हुयी शाम है, हल्के हल्के बादल है... ठंडी हवा चल रही है... पास वाली बेंच पर कई बुज़ुर्ग आपस में कुछ बातें कर रहे हैं... ऊपर से तो वो मुस्कुरा रहे हैं लेकिन उनकी आखें सुनसान हैं... उस सन्नाटे को शायद शब्दों में उतारना मुमकिन न हो सके.... उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर सभी के जहन में "क्या खोया-क्या पाया...." जैसा कुछ ज़रूर चलता होगा... कितनों के चेहरे पर इक इंतज़ार सा दिखता है... इंतज़ार उस आखिरी मोड़ का... जहाँ के बाद क्या है किसी ने नहीं देखा... किसी ने नहीं जाना...  उसकी ठीक दूसरी तरफ प्ले ग्राउंड में कुछ बच्चे खेल रहे हैं, उनकी दुनिया में कोई परेशानी नहीं है...परेशानियां है भी तो कितनी प्यारी-प्यारी सी... किसी की बॉल किसी दूसरे बच्चे ने ले ली, किसी के पैरों में थोडा सा कीचड लग गया... किसी को आईसक्रीम खानी है... उन छोटे छोटे बच्चों के आस-पास ही तो ज़िन्दगी है... ज़िन्दगी उन्हें दुलार रही है, ...

Surprise of Ankita baby

Surprise of Ankita Surprise of Ankita

कुछ बातें जो कहनी है तुमसे....

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ना जाने यह मेरा अतीत है या और कुछ... पर ना जाने मुझे मेरी डायरी का पन्ना इतना बेचैन सा क्यों लग रहा है.... हर शाम हवा के धीमे से थपेड़े से भी परेशान होकर फडफडाने लगता है... आज उस पन्ने को खोलते हुए एक सुकून सा लग रहा है...  *******************

मैं तुमसे भाग के भी तुम तक ही आऊँगा...

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दिन भर की इधर उधर बेमानी सी बातों के इतर जल्द से जल्द घर पहुँचने की जाने क्यूँ अजीब सी हड़बड़ी होती है... शायद एक कोने में लौटने भर का सुकून ही है जो मुझे आवारा बना देता है...  कभी कभी मुझे डर लगता है कि अगर मैं किसी दिन शाम को घर नहीं लौट सका तो डायरी में समेटे हर्फ बिखर तो नहीं जाएँगे... हर सुबह मैं कितना कुछ अधूरा छोडकर उस कमरे से निकलता हूँ, उस अधूरेपन के लिबास पर कोई पासवर्ड भी नहीं लगा सकता... में बारिश भी तो हर शाम होती है, और मैं हर सुबह खिड़की खुली ही भूल जाता हूँ... अगर कभी ज़ोरों से हवा चली तो वो खाली पड़े फड़फड़ाते पन्ने मेरे वहाँ नहीं होने से निराश तो नहीं हो जाएँगे... हर सुबह उस खिड़की से हल्की हल्की सी धूप भी तो आती है, उस धूप को मेरे बिस्तर पर किसी खालीपन का एहसास तो नहीं होगा... मेरे होने और न होने के बीच के पतले से फासले के बीच मेरी कलम फंसी तो नहीं रह जाएगी न, उस कलम की स्याहियों पर न जाने कितने शब्द इकट्ठे पड़े हैं, उन्हें अलग अलग कैसे पढ़ पाएगा कोई...  मैं कमरा भी ज्यादा साफ नहीं करता, मेरे कदमों के निशान ऐसे ही रह जाएँगे... उन निशानों को मेरी आहट क...