गुबार है, निकल जाये तो बेहतर है....


मुझे नहीं पता इंसान धोखा देने पर या झूठ बोलने पर कब मजबूर होता है.... लेकिन जब ऐसा कुछ हो कि आपको बहुत गर्व हो कि आपने किसी को धोखा दे दिया तो याद रखना चाहिए कि सामने वाला मूर्ख नहीं बल्कि उसे आप पर भरोसा है, धोखा उसे ही दिया जा सकता है जिसे आप पर भरोसा हो.... खुद को उम्र मे बड़ा और समझदार बताने वाले कभी कभी ऐसी हरकत कर गुजरते हैं कि उनकी समझदारी दो कौड़ी की भी नहीं रह जाती... अब तक कई लोगों ने विश्वास तोड़ा है, मानसिक और आर्थिक दोनों तरीके से नुकसान पहुंचाया है शायद इसलिए कि मैं जल्दी ही किसी पर भरोसा कर लेता हूँ... लेकिन खुशी है कि उन लोगों में से सभी लोगों की नज़दीकियों से उबर गया हूँ, कुछ लोग कहते हैं कि असल बात तब हो जब वो लोग मेरे नजदीक रहते हुये भी मुझपर कोई प्रभाव न डाल पाएँ, लेकिन संभव नहीं हो पाता... हाँ, चाहूँगा ज़रूर कि ऐसा हो पाये भविष्य में, इसलिए कुछ अनचाहे लोगों को न चाहते हुये भी ज़िंदगी में रख छोड़ा है, देखते हैं नज़रअंदाज़ कर के भी... 

ज़िंदगी की करवटें बहुत कुछ सिखाती हैं, कुछ करवटें ज़िंदगी के बिस्तर पर सिलवटें भी छोड़ जाती हैं... सिलवटें जितनी जल्दी सीधी हो जाएँ बेहतर है... पिछले डेढ़ साल इम्तहान के थे, कई मानसिक दवाब थे, बहुत कुछ ऐसा हो रहा था जिससे चाहकर भी दूर नहीं भागा जा सकता था... लेकिन इतना यकीन था कि एक दिन कुछ न कुछ तो बदलेगा ही... ज़िंदगी की बैकफुट पर सही वक़्त का इंतज़ार कर रहा था... 

आज जब बहुत वक़्त बाद ज़िंदगी ने शांति के कुछ पल सौंपे हैं, तो एक गहरी सांस लेकर खुले दिल से इसे एंजोय करना चाहता हूँ, फायनली खुशी और सुकून आ ही गया है हिस्से में... मैं ये नहीं कहता कि अब ज़िंदगी में सब कुछ अच्छा ही होने वाला है लेकिन कुछ बुरे हालातों और लोगों से उबरना अच्छा लग रहा है..... 

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ना ही इस पोस्ट में कुछ साहित्यिक है और न ही कुछ पढ़ने लायक....  मन में एक गुबार था उसे बाहर निकाल देने की कोशिश है बस...

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