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अक्टूबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

closed room....ugg yeh ratein

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इन दिनों मैं बहुत कुछ ऐसा सोचने लगा हूँ जो मैं नहीं चाहता कि तुम पढ़ो, कुछ रद्दी से पड़े पन्नों पर लिखकर उसे फाड़ कर फेक देता हूँ.... कभी हमारे बीच में की गयी कुछ अनकही बातों के सिरे को भी पकड़ो तब भी उससे नयी कोई बात नहीं निकलती... ससर गाँठ की तरह सारी पुरानी बातों के गिरहें खुलकर बस सीधा सन्नाटा बच जाता है... मैं फिर से ख़ानाबदोश होने लगा हूँ, दिन भर बेफालतू इधर उधर बौखलाया फिरता हूँ ... इंसान चाहकर भी अपनी परछाईयों से नहीं भाग सकता, शायद इसलिए मुझे अंधेरा अच्छा लगता है... किसी से नज़र चुराने की ज़रूरत नहीं है, खुद से खुद की बातों में खो जाना ही असीम सुख है... कितना अच्छा होता न अगर अंधेरा ही सच होता, इस तेज रौशनी में मेरी आखें चौंधिया जाती है, दिल में जलन होती है सो अलग...  शाम को इस अंधेरे से कमरे में बैठकर अपने अंदर की रगड़ सुन रहा हूँ, दिमाग बार-बार दिल को कहता है आखिर ज़रूरत क्या थी इश्क़ करने की, अब भुगतो... और दिल चुपचाप खुद को एक कमरे में बंद कर लेता है, मुझे डर लगता है कहीं यूं अकेले रहते रहते मैं किसी बंद कमरे में तब्दील न हो जाऊँ...  रात एक माचिस है,  और ...

मेरे बीते हुए पल....

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काश मेरे बीते हुए पल मेरे पास होते हैं... आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है... मैं नहीं जानता कि मेरे साथ ही ऐसा होता है तुम्हारे साथ भी ऐसा होता होगा इन दिनों ऐसा लगता है जैसे मैंने अपना वजूद एक बार फिर से खो दिया है, चाहे कितना भी खाली वक़्त मिल जाये समझ नहीं आता कि क्या करना है... कितनी ही बार पूरा दिन ऐसे ही बिस्तर पर पड़े पड़े ही गुज़ार दिया है... पता नहीं क्यूँ मुझे कोई इतना अच्छा नहीं लगता कि उससे बात की जाये, लगता है अकेले ही वक़्त बिता लिया जाये तो बेहतर है... इतने सालों की जद्दोजहद के बाद जमापूंजी के रूप में बस कुछ खूबसूरत यादें हैं, अब तो उनको याद करके भी आँसू ही आते हैं... "डैडी" फिल्म में एक संवाद था न कि "याद करने पर बीता हुआ सुख भी दु:ख ही देता है...." मैं शायद उम्र के ऐसे दौर पर हूँ जब मूड स्विंग्स होते हों, लेकिन जिस रंज और दर्द के शहर में अपना वजूद तलाश रहा हूँ वो मुझे अपने ब्लॉग या डायरी में ही मिलता है.... कितनी अजीब बात है मेरे ब्लॉग का पता हर किसी के पास है अलबत्ता यहाँ कोई अपना दर्द पढ़ने नहीं आता, शायद कुछ लोग ऐसे होंगे जो इस दर्द में अपना...

सपने

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सपने या तो अच्छे होते हैं या फिर बुरे पर मेरे सपने इन दायरों में नहीं आते मेरे सपने खौफनाक होते हैं मेरे सपने मुझे उन हादसों से रूबरू करवाते हैं जिनके पीछे दर्दनाक इतिहास होता है जैसे की ये घर  मुझसे पहले इस घर  में रहने वाली एक लड़की की गला घोंटकर हत्या की गई थी मुझे आज भी उस लड़की की चीखें सुनाई देती है रात दर रात उसकी मौत का आधा अधूरा मंजर मेरे सपने में और साफ होता जा रहा है अब तो जागते हुए भी ऐसा लगता है जैसे कोई आस पास है पर मैं बस यही उम्मीद करता हूं कि बुरे सपनों का यह दौर  बस यहीं तक सीमित रहें                                                                               ...