गोद और कन्धे की तलाश...

गोद और कन्धे से लगकर कितना शकुन मिलता है गोद मिले तो आंखे नम हो जाती है कन्धा मिले  तो दिल ख्यालो मे अटक जाता है मेरा भी तो गोद कन्धे का सहारा खो गया है आंखे बंद करता हू तो वो नजर आती है आंखे खोलता हो तो वो नजर आती है "क्या वजह थी" "क्या वजह थी" क्यों सिर्फ  मुझे ही मेरा नही प्यार नही मिला  इन सवालो  से रोज लढ़ता हू मैं दस्को से     सोया नही हू शकुन की एक झपकी लेने के लिए कोई गोद ढूंढता  हू कोई कन्धा ढूंढता हू लेकिन मैं उस तढ़फ को अपने अंदर शांत नहीं होने देता  मैं उस आग को बुझने नहीं देता मैंने उस दर्द को अपनी ताकत बनाया है खुद को इस काबिल बनाया है कि एक नजर में ही इंसान की रूह तक पढ़लू...
यह बड़ा आसान है ये येसा है जैसे किसी मां का बच्चा खो गया हो और वह सदियों तक हर चेहरे से सवाल पूछती फिरे के  मेरे जिगर का टुकड़ा देखा है कहीं हर चेहरे को देखकर वह अंदाजा लगाती फिरे कि कहीं यही तो नहीं वो किसी भले इंसान ने उसे पाल लिया होगा बड़ा हो गया होगा शादी कर ली होगी मुझे याद करता होगा ऐसे जख्म कभी नहीं भरते क्या उस मां को नींद आती होगी नही अब या तो वो   मां सारी जिंदगी किसी जिंदा लाश की तरह यहां वहां भटकती रहेगी या फिर वो कमर कसेगी और दुनिया में खोए हुए दूसरे मासूमों को संभाल कर खुद को थोड़ा सुकून पहुंचाएगी उस मां की नजर बाकी मांयो  से ज्यादा तेज होगी वह चेहरे पढ़ने और  जरुरते समझने में ज्यादा ऐक्सप्रट हो जाएगी बच्चों से जुड़ी हर जानकारी हर किताब उसके लिए किसी कुरान से कम ना होगी यह बड़ा आसान है बस तुम्हें कीमत चुकानी होगी तुम्हे अपने जिगर के टुकड़े को गवाना होगा ताकि तुम्हारी आंखें खुले और ऐसी खुले की फिर बंद ना हो ये आग मुफ्त में नहीं मिलती तुम्हें ख़ुद को जलाना पड़ता है तुम किसी और के खून  से अपनी कलम रंगीन नही कर सकते  तुम्हें अपना खून बहाना होगा ।....

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