तुम्हारी यादों मैं डूबी एक शाम.. तुम नहीं हो तो क्या हुआ, तुम्हारा एहसास तो है...
तुम्हारी बहुत याद आ रही है क्या करूं क्या तुम्हारी याद भी ना आजकल बहुत सताने लगी है मुझे अब मैं क्या करूं क्या मैं अपनी डायरी में तुम्हारे बारे में लिखकर कुछ सुकून पहुंचा हूं अपने आप को अपने इस दिल को...
आज की शाम पिछले एक महीनों की शाम से थोड़ी अलग है... पिछले गुज़रे एक महीने की पोठली बना कर जो तुम मेरे पास छोड़ गयी हो...
उस पोठली में कितना कुछ है,
वो.. अपनी Facebook का पासवर्ड... वो.. अपनी cover फोटो...
वो तुम्हारी call... वो तुम्हारी बातें.. प्यारी प्यारी सी ...
एक दूसरे को पागल पागल कहना...
वो तुम्हारा मुस्कुराना....
अपनी हंसी को हथेली से छुपाना...
चुपके चुपके आंसू बहाना....
आंसुओं से अपनी पलकों को भिगोना...
और तुम्हारे वो बर्थडे वाला केक वह अभी भी मेरे पास है...
तुम्हारी इन सब चीजों को तो मैं देखकर याद करता हूं तुम्हारी cover फोटो तुम्हारा पासवर्ड तुम्हारा नंबर को देखकर मैं तुम्हें बहुत याद करता हूं....
तुम्हारी cover फोटो देखकर सोचता हूं तस्वीर में से निकल कर मेरे पास सामने आ जाओ और मुझे गले से लगा लो.....
कितना सुकून देता है ना किसी अजनबी को अपने गले लगा के उसके साथ आंसू बहाना और उन आंसुओं को पोछना...
सोचता हूं तुम्हारी यादों के आंसुओं को अपनी चांदी की डिब्बी में डाल कर ले जाऊं.. तुम्हारी यादों को समझ कर...
तुम ही तो हो जो काफी दिनों से मेरे लिए वजह बनी मेरी जिंदगी की किताब को आगे बढ़ाने की मेरी डायरी को आगे बढ़ाने की..... काफी दिनों से की सूखी पड़ी थी मेरी जिंदगी और मेरी जिंदगी की किताब भी...
जैसे पानी के झरने रुके हुए हो हो उसी तरह...
वरना हार.. गया था मैं अपने दिल टूटने के बाद...
जैसे-जैसे इस पोठली के एक एक खजाने के साथ इस शाम का हर एक अकेला लम्हा गुज़ार रहा हूँ,
उतना ही ज्यादा और ज्यादा खुद को तुम्हारे करीब पाता हूँ...
पूरा शहर अपने आप में मगन है, वही गाड़ियों की आवाजें, कुछ बच्चे बगल वाली छत पर खेल रहे हैं, बीच बीच में कोई फेरीवाला भी आवाज़ लगा जाता है....
लेकिन इस सबसे अलग मैं इस शहर से कुरेद कुरेद कर तुम्हारी हर एक झलक को अपनी पलकों के इर्द-गिर्द समेटने की जुगत में लगा हूँ...
इस शहर की हवाओं में बहुत कुछ बह रहा है, इन हवाओं में घुले तुम्हारे एहसास को अपनी साँसों में भर के एक ठंडक सी महसूस कर रहा हूँ...
कई सारे लफ्ज़ हैं जो इन कागज़ के पन्नों पर उतरने के लिए धक्का-मुक्की मचाये हुए हैं, उन सभी लफ़्ज़ों को करीने से सजा कर एक ग़ज़ल लिखना बहुत मुश्किल जान पड़ता है कभी न कभी कोई एक्स्ट्रा लफ्ज़ उतरकर इसे खराब किये दे रहा है...
छुट्टी का दिन बहुत शानदार होता है न, ..ज़िन्दगी की हर एक शय को हम फुर्सत में देखते हैं, ..आज भी अकेले यूँ बैठा बैठा उन कई सारे अँधेरे लम्हों को मोमबत्ती की लौ से रौशन कर रहा हूँ,...
तुम्हें लगता होगा मैं तुम्हें मिस कर रहा होऊंगा,.. लेकिन नहीं मैं तो उन बीते पन्नों को पढ़ पढ़ कर खुश हुआ जा रहा हूँ जहाँ से होकर गुज़रते हुए आज तुम्हारे लिए ये लम्हा चुराया है और ये ख़त लिख रहा हूँ...
सुनो,
तुम्हें पता है जब भी अपने आने वाले कल के बारे में सोचता हूँ,.. तो मुझे क्या नज़र आता है ? एक लॉन और उसमे लगा एक झूला, काफी देर तक उस लॉन में खड़ा रहता हूँ, फिर सामने की तरफ देखता हूँ तो एक घर, सपनों का घर... पीली- नीली दीवारें, ..हरी खिड़कियाँ, खिडकियों पर झूलती तुम्हारी पसंद के मनीप्लांट की लताएं... बालकनी में लगी वो विंड-चाईम... सिर्फ एक घर नहीं बल्कि उसके चारो तरफ लिपटे हमारे ढेर सारे सपने...
आने वाले आधे महीने के बीच हो सकता है न जाने कितने ही ऐसे लम्हें आयेंगे जब हम एक धागे के एक एक छोर को पकडे एक-दूसरे से मिलने का इंतज़ार कर रहे होंगे, लेकिन मुझे यकीन इस बात का ज़रूर है कि जब हम मिलेंगे बहुत खूबसूरत होगा वो लम्हा...
खैर, बाहर का मौसम बहुत खुशगवार हो रहा है,
हलकी बारिश और सर्द हवा... हवा चलती है तो जिस्म से हरारत सी पैदा होती है, फिर जल्दी से तुम्हारे यादों की चादर ओढ़ कर खुद को खुद में समेट लेता हूँ...
कैफ़ी आज़मी जी की एक ग़ज़ल याद आ रही है...
वो नहीं मिलता मुझे इसका गिला अपनी जगह
उसके मेरे दरमियाँ फासिला अपनी जगह...
तुझसे मिल कर आने वाले कल से नफ़रत मोल ली
अब कभी तुझसे ना बिछरूँ ये दुआ अपनी जगह...
इस मुसलसल दौड में है मन्ज़िलें और फासिले.
पाँव तो अपनी जगह हैं रास्ता अपनी जगह...
इस डायरी में तुम्हारी यादों को पलट पलट कर देख रहा हूं...


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