तंग जिदंगी से आत्महत्या ही मेरी सहेली हैं।

कभी कभी जिंदगी मे मौत ही साथ देती है आत्महत्या सिर्फ नाकामयाबी की वजह नही होती बल्कि कई ऐसे कारन होते है किसी की अगर इज्जत मिट्टी मै मिल जाये तो आत्महत्या का शिकार दिखाई देता है कभी कभी लगता है कि सच मे अब मौत ही साथ देगी कई बार मां के साथ कहा सुनी या उसकी कोई बात मन को लग जाती है तो कई बार अपनी हाथ की नस काट कर जिदंगी को विदा करने की कोशिश करता हू लेकिन इतनी   हिम्मत जुटा पाना मुश्किल लगता है फिर कुछ देर बाद मन हल्का होता है तो मन कहता है कि तू बुजदिल है जो जीते जी मौत को गले लगा रहा है और मुझे एहसास भी हो जाता है कि मैं कितना गलत करने चला था कुछ लोग इस काम मैं कामयाब हो जाते होगे तो मुझे नही लगता कि उनकी आत्मा को शांति मिलती होगी उनकी आत्मा बस यहा बहा भटकती रह जाती  होगी.
उसकी आत्मा को पछतावा होता होगा कि मुझे ऐसा नही करना चाहिए था उनकी आत्मा को शांति मिलती होगी या नही वो तो भगवान ही जाने लेकिन जिदंगी के खेल भी तो देखो पता नही किस किस मौढ़ से गुजरना पढ़ता है कि आत्महत्या को अपनी  सहेली बना कर उसके पास जाना ही पङता है।खैर अगर मै इस पोस्ट को लिख कर आपका दिल छोटा  कर रहा हू तो माफ कर देना।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Tumhari yadon mein dobbi ek subah.... happy birthday

closed room....ugg yeh ratein

तेरे मेरे प्यार की यादो मे बसा एक बुथ बगला